जलते बुझते ख्वाबों का इक क़स्बा लेकर

जलते बुझते ख्वाबों का इक क़स्बा लेकर

शहर की जानिब निकल पड़े हम क्या क्या लेकर

हर एक बार उसे "फिर कभी" कह जाते हो

पछताओगे दिल को इतना हल्का लेकर

मसले का तो कुछ भी हल हम ढूंढ न पाए

सो बैठ गए इधर उधर का मसला लेकर

पता नहीं क्यूँ तुम तक ही मैं आ जाता हूँ ?

अपनी सारी शिकायतों का दरिया लेकर

पैरों ने जो थमना चाहा तो यूँ लगा कि

भाग न जाये कोई मेरा रस्ता लेकर

अब तो सारे हो जाएंगे मुरीद उसके

वो आया है अच्छा ख़ासा 'जुमला' लेकर

- विश्वजीत गुडधे

Primarily I write Ghazals. Published poems in two Poetic Collective Books namely "Rutu Shabdanche" & "Soor Mazyamaniche" Poetry published in various magazines, journals & newspapers. Lyricist for : Music Album titled "Chandane Fulafulanche", Documentary Film called "Kaudanyapur"; songs sung by renowned singer Uttara Kelkar, Title song of GCOEA's Technical Festival Prajwalan - Kashtiya